भाई की दीवानी

मैंने फ्रेश होकर बाथ लिया और नाश्ता किया। घर पर अकेली ही थी मैं, तो बोर हो रही थी। शाम को दीदी अपने साथ खाना लेकर आई और मुझे खाना देकर बोली- खाकर सो जाना।
मेरे साथ गैरों वाला बर्ताव हो रहा था।
इसी तरह मैंने दो दिन गुजारे।

अगले दिन जब सुबह उठी तो दीदी घर पर नहीं थी। मुझसे यहां रुका नहीं जा रहा था; मैं खुले पहाड़ों में रहने वाली … यहां की घुटन सहन नहीं हो रही थी। मैंने कपड़े पैक किये और बाथ लिया। वापस घर जाने की तैयारी की लेकिन मुझे रास्ता भी नहीं मालूम था। मैंने बुआ जी के लड़के संजय को कॉल किया और उनको सब बताया तो उन्होंने कहा- आप यहीं रुको, और मुझे अपने अपार्टमेंट का नाम बताओ, मैं खुद लेने आऊंगा आपको! क्योंकि मैं खुद दिल्ली में हूँ और आज शाम को घर जाऊंगा।

मैंने अड्रेस मेसेज किया और भाई 1 घण्टे में एड्रेस पर पहुंच गए। मैंने उनको अंदर बुलाया और पानी पिलाया। मैं चाय बनाने के लिए रसोई में गयी तो भाई भी मेरे साथ आ गए और घर के बारे में और निकिता दीदी के बारे में पूछा।
फिर हमने चाय पी और बातें करने लगे।

भाई ने बताया- मैं यहाँ किसी काम से आया हूँ और यहां होटल में ठहरा हूँ. अगर तुमको अभी चलना है तो अभी चलो, या फिर दोपहर बाद चलेंगे, तब तक मैं नहा लूंगा।
मैंने कहा- नहा लो।
तभी भाई बोले- दो महीने हो गए, आज मेरे साथ नहीं नहाओगी?
मैने हाँ कर दी क्योंकि इन दो महीनों मैं मैंने अपनी चूत को छुआ तक नहीं था, मेरा भी मन हो रहा था।

तो मैंने पहले पापा को कॉल किया- मैं वापस जा रही हूँ, यहां मेरा मन नहीं लगता। और संजय भाई जी आये हुए हैं, उनके साथ जा रही हूँ।
तब पापा ने अनुमति दी घर जाने की और संजय से बात की।

तभी भाई ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने सीने से चिपका लिया और मेरे माथे पर किस करते हुए बोला- चलो अब बाथरूम में!
मैं वहीं उनसे चिपके हुए खड़ी रही।
तब संजय ने मुझे अपनी बाँहों में उठाया और बाथरूम में ले गए। बाथरूम में मैंने एक एक करके संजय के सभी कपड़े उतार दिए और संजय ने भी मुझे बिल्कुल नंगी कर दिया।

मेरी चूत पर बाल थे तो संजय ने कहा- इनको साफ तो कर लेती?
मैंने कहा- भाई, आप कर दो।
तभी संजय ने कहा- चलो निकिता के रूम में … वहां शायद क्रीम मिल जाये।
दीदी के रूम में से क्रीम लेकर हम वापस बाथरूम में आ गए और भाई ने चूत को पानी में भिगो कर क्रीम लगा दी।

15 मिनट तक भाई मेरे होंठ चूसते रहे और मेरी चूचियाँ दबाते रहे। फिर भाई ने चूत से क्रीम को साफ किया जिससे मेरी झांट के बाल भी बिल्कुल साफ हो गए और एकदम से गुलाबी चूत भाई के सामने थी।
भाई ने मेरा मुख शॉवर की तरफ कर के थोड़ा आगे को झुक दिया और मेरे हाथों को दीवार से सटा दिया और मेरे पीछे आकर अपने लण्ड को मेरे कूल्हों के बीच में सटा कर शावर चला दिया।
भाई अपने हाथों को मेरी चूचियों पर रख कर सहलाने लगे। मेरी पीठ पर किस करते तो कभी मेरी गर्दन पर और जोर से चूचियों को मसलने लगे।

मैं सातवें आसमान पर थी। मैं शब्दों में बता नहीं सकती कि मुझे कितना मज़ा आ रहा था।

तभी भाई अपना लण्ड मेरी चूत और गांड पर रगड़ने लगे और अपने होंठों को मेरे कान के पास लाकर धीरे से बोले- यार मोनिका, डाल दूँ क्या?
मैं- हाँ भाई, डाल दो।
संजय- कहाँ?
मैं- जहां आपको अच्छा लगे।
संजय- मुझे ही अच्छा क्यों … तुमको भी तो अच्छा लगना चाहिए ना!
मैं- जहां आपको अच्छा लगे, वहां मुझे अच्छा लगेगा।

संजय ने धीरे से मेरी गांड पर लण्ड रख कर दबाव बनाया तो लण्ड का सुपारा अंदर चला गया।
मुझे बहुत दर्द हुआ मेरी आँखों से आंसू निकल आये।

तभी संजय ने मेरे दर्द को समझते हुए लण्ड बाहर निकाल लिया और मेरी चूत में डालने लगे. मुझे हल्का हल्का दर्द हुआ क्योंकि मुझे दो महीने हो गए थे सेक्स किये हुए।
हम दोनों बहन भाई शॉवर के नीचे कुछ देर यूँ ही खड़े रहे।

फिर भाई ने लण्ड बाहर निकल कर शावर बन्द किया और तौलिये से अपना और मेरा बदन साफ किया और मुझे नंगी ही बाँहों में भर कर बैडरूम में ले गए। मुझे बेड पर लेटा दिया और खुद बेड पर लेट गए और मुझे अपने ऊपर खींच लिया.

हम दोनों के होंठ आपस में मिल गए, मेरी मुलायम जीभ को उन्होंने अपने मुंह में लेकर चूसा। मैं तो और भी गर्म हो चली थी। अपने नंगे बदन को मैं भाई के नंगे बदन से रगड़ने लगी। भाई का पूरी तरह तना हुआ लम्बा और मोटा लण्ड किसी लोहे की रोड की तरह, मेरे पैरों के बीच में से मेरी गांड को छू रहा था। मैं अपनी दोनों कड़क चूचियां भाई की हल्के बालों वाली छाती पर रगड़ रही थी।

मैं भाई का लंड अपनी चिकनी चूत में लेने को बेक़रार थी। मैंने अपना हाथ नीचे कर के संजय के लंड को पकड़ कर अपनी चूत पर लगाया। उन के हाथ मेरे बदन पर घूमते हुए मेरी गोल गोल गांड पर पहुंचे और मेरी गांड को दबाया। उन की उँगलियाँ कई बार मेरी गांड के बीच की दरार में घूमी तो मैं और भी बेक़रार हो जाती।

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