एक अनोखी प्रेम कथा

अब कमला को सिर्फ एक संतान की आशा थी की काश! किसी तरह वो रमेश के बच्चे की माँ बन जाती तो अपना पूरा जीवन अपनी उस संतान के भरोसे काट देती. लेकिन शायद किस्मत को ये भी मंजूर नहीं था.

उधर इन्दर भी जेल से छूट गया था और साल भर बाद उसकी शादी भी हो गयी थी. वो भी अपनी खेती किसानी में व्यस्त हो गया था. शहर जाकर अनाज वो खुद बेच कर आता. ऐसे ही एक दिन जाब वो शहर जाने के लिए बस में सवार हुआ तो अचानक उसकी नजर बस में बैठी कमला पे पड़ी. दोनों की नजरें मिली और एक क्षण में ही दोनों के मन में उनका पिछला जीवन घूम गया. कमला ने मुस्कुरा कर इन्दर से अपने पति का परिचय कराया. बस से उतर कर इन्दर ने कमला से पूछा- शहर किस लिए आई हो? रमेश की मानसिक अवस्था का इलाज कराने?

कमला ने उदासी से कहा- नहीं! इसके लिए डॉक्टर सालों पहले जवाब दे चुके हैं.

इन्दर- फिर किस लिए?

कमला ने सवाल टालते हुए कहा- इन्दर! सालों बाद मिले हो! चाय नहीं पिलाओगे?

वो तीनों एक रेस्टोरेंट में जाकर बैठ गए. वहां ज्यादा भीड़ नहीं थी. रमेश का भोलापन इन्दर को भी अच्छा लगा. लेकिन जैसे ही उसे याद आया उसने फिर कमला से पूछा- तुमने बताया नहीं, शहर किस लिए आई हो?

इस बार कमला की आखों में आंसू आ गए. उसने इन्दर से कहा- इन्दर अब मेरे जीवन में ज्योति मेरी संतान ही ला सकती है. लेकिन मेरी फूटी किस्मत देखो! मेरी ये ख्वाहिश भी अधूरी ही रह जाएगी.

इन्दर ने कमला का हाथ पकड़ लिया और बोला- कमला! ऐसे मत रो!

पास बैठा रमेश भी कामला को चुप कराने लगा. कमला के चेहरे पे रमेश की हरकत देखकर मुस्कान आ गयी और इन्दर का भी मन भर आया.

शहर से लौटते समय भी तीनो साथ आये. रास्ते में इन्दर ने प्रस्ताव रखा- कमला! क्या मैं तेरी ये कमी पूरी कर दूं?

कमला नाराज हो गयी. फिर रास्ते भर उसने इन्दर से कोई बात नहीं की. बस से उतर कर दोनों अपे अपने गाँव चले गए. फिर महीनों तक कोई किसी से नहीं मिला. लेकिन कमला के अन्दर की इच्छा धीरे- धीरे उसका दम घोंट रही थी.

सर्दियाँ आ गयीं थी. एक दिन शाम को अचानक इन्दर ने कमला के दरवाजे पे दस्तक दी. इन्दर को यूँ देखकर कमला ने उसे अन्दर आने को कहा. कुछ देर की ख़ामोशी के बाद इन्दर ने बताया की उसकी पत्नी का भी देहान्त हो गया है और वो हमेश के लिए इस मनहूस गाँव को छोड़ कर जाने वाला है. लेकिन जाने से पहले वो उसके जीवन में आई एक मात्र ख़ुशी से मिल कर जाना चाहता था.

कमला को ये जानकार बड़ा दुःख हुआ. वो रो रही थी. इन्दर भी रो रहा था. अचानक से रमेश आया और उन दोनों के आंसू पोछता हुआ बोला- तुम दोनों एक दुसरे को क्यां रुलाते हो? उस दिन भी रुलाया था आज भी रुला रहे हो. मैं तो सिर्फ तभी रोता हूँ जब मेरा कोई खिलौना खो जाता है. है न कमला?

कमला ने कहा – हाँ! और मुस्कुरा दी.

रमेश ने फिर कहा- इन्दर तुम भी कमला के लिए खिलौना ला दो. वो चुप हो जाएगी. बोलो लाओगे न? लेकिन जब तुम खिलौना लाना तो मेरे लिए भी लाना. मैं भी उससे दिन रात खेलूंगा.

इन्दर और कमला एक दुसरे का मुँह देखने लगे.

रात हो रही थी. कमला ने रमेश को खाना खिला दिया था और अब रमेश सो रहा था. कमला ने इन्दर के लिए खाना परोस दिया. इन्दर चुप चाप खाना खा रहा था. कमला भी चुप थी. दोनों खामोश थे लेकिन दोनों के अन्दर एक तूफ़ान मचा हुआ था. दोनों ने खाना ख़त्म कर लिया और हाथ मुँह धोकर बैठके में पड़ी चारपाई पे बैठ गए. चुपचाप….शांत….एक गहरी ख़ामोशी चारों ओर छाई थी.

अचानक कमला उठी और इन्दर के पीठ के पीछे घूम कर चली गयी. फिर उसने धीरे से कहा- इन्दर! तुम चले जाओ! यहाँ से दूर जाकर एक नयी दुनिया बसाओ. जीवन चाहे कितना भी कठोर क्यों न हो, उसे जीने की चाह नहीं छोडनी चाहिए. जाओ और एक नयी शुरुवात करो.

इन्दर ने कहा- कमला! इतने सब के बाद भी जाने क्यों चित्त शांत हो चुका है. अब हिमालय की ओर जाना चाहता हूँ. जाने क्यों अब कोई दुःख भी नहीं होता. है तो सिर्फ एक टीस….जो रह रह कर सीने में उठती है कि मैं चाह कर भी तुम्हारा साथ न निभा पाया. तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पाया…

कह कर इन्दर शांत हो गया और अपने दोनों हाथों से अपने चेहरे को ढँक लिया. कमला वापिस घूम कर इन्दर के सामने आई. उसने इन्दर के हाथों को उसके चेहरे से हटाया. इन्दर की आखें बंद थीं और बंद पलकों के किनारों पे आंसुओं के मोती चमक रहे थे.

कमला ने इन्दर का हाथ अपने हाथों में लिया और धीरे से कहा- इन्दर अपनी आखें खोलो!

इन्दर ने अपनी आखें धीरे-धीरे खोलीं. लेकिन ये क्या उसके सामने निर्वस्त्र कमला खड़ी थी. जीवन में पहली बार. उसने चेहरा घुमा लिया लेकिन कमला ने वापिस उसका चेहरा अपनी ओर किया और बोली- इन्दर! मुझे मेरा खिलौना दे दो. और यहाँ से चले जाओ.

इन्दर ने एक बार कमला की ओर ऊपर से नीचे देखा. वो कांपते अधर…फिर सुराहीदार गर्दन जिसमे काली मोतियों वाला मंगलसूत्र था. फिर उसकी नजरें और नीचे कमला के उन्नत स्तनों पे गयीं. दोनों भरी-पूरी चूचियों के बीच मंगल सूत्र का लॉकेट फँसा हुआ था. फिर पेट की सपाट घाटी से इन्दर की निगाहें फिसलती हुयी कमला की सुदर्शना नाभि पे गयी. उसके नीचे कमला की थोड़ी उभरी योनी थी. जो कमला की मांसल जांघों के मध्य छिपी हुयी थी.