कमसिन गांड की चुदाई

kamukta ‘क्या खाक हो गया. मैं मर गई थी क्या. मेरी गाण्ड चोद देता. उस बच्ची की गाण्ड फ़ट गई तो. ?’

‘चाची, रहने दो. शायद ठीक से मार दे. कोशिश करती हूँ. ‘ मैंने अंकल की तरफ़दारी की।

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‘अरे गाण्ड में तेल या क्रीम लगाई थी या नहीं. या सूखी सूखी गाण्ड मार रहा है?’

राजेश ने जल्दी से अपना लण्ड बाहर निकाल लिया और अपने सिरहाने क्रीम उठा कर प्रियंका को दे दी।
चाची ने ठीक से पहले राजेश के लण्ड पर क्रीम लगाई फिर मेरी गाण्ड को खोल कर छेद पर क्रीम लगा दी।
चाची ने जब अपनी अंगुली से क्रीम गाण्ड के अन्दर बाहर क्रीम लगाई तो मुझे बहुत आनन्द आने लगा।

‘चाची, बहुत मजा आ रहा है। ये ले तू भी राजेश की गाण्ड में क्रीम लगा कर देख।’

मैंने क्रीम ले कर राजेश की गाण्ड में अंगुली डाल कर क्रीम लगाई तो उसके मुख से सिसकी निकल पड़ी।

‘आह. यशोदा बहुत आनन्द आ रहा है. और कर यार जल्दी जल्दी कर !’

‘यशोदा. इसकी गाण्ड ही मार दे अपनी अंगुली से. ‘

खूब देर तक राजेश अपनी गाण्ड में क्रीम लगा कर अंगुली से करवाने का आनन्द लिया। फिर राजेश ने मेरी गाण्ड को सेट किया।

‘आह. चाची, यह तो एक ही बार में घुस गया. पूरा घुसा दो अंकल !’

पर राजेश को तो अब मेरी गाण्ड चोदने में आनन्द आने लगा था। वो मेरी गाण्ड के साथ बहुत देर तक धक्कम पेल करता रहा।

इधर चाची मौका पाकर मेरे पास आकर मेरी चूत को चूसने लगी। दोनों तरफ़ से मार खा कर मैं तो निहाल हो उठी। मैं एक बार फिर से झड़ने लगी. अंकल भी मेरी गाण्ड में ही झड़ गये।
झड़ने के बाद जाने कब मेरी आँख लग गई और मैं सवेरे देर तक सोती रही। मैं उठी तब दोनों चाय की मेज पर चाय व नाश्ता सजा रहे थे।

दोनों बातें कर रहे थे। मैंने उनकी बाते सुनने की कोशिश की।

‘कैसा आनन्द आया कल ! है ना राजेश?’

‘प्रियंका, तुमने भी तो यशोदा को कैसे लपेटे में ले लिया।’

‘अरे यशोदा जैसी लड़कियों को पटाना तो मेरे बायें हाथ का खेल है।’

‘वो कैसे?’

‘एक तो जवानी का नशा. फिर उसे अपनी चुदाई का जलवा भी दिखा दिया था. फिर उसे यकीन दिलाना कि चुदाई करवा के देख ! मजा ही मजा है. ‘

‘तो अगली बार किसका नम्बर लगवा रही हो. ?’

‘अभी तो मेरी यशोदा रानी का मजा पूरा मजा तो ले लो. लड़किया तो दुनिया भर में भरी पड़ी हैं।’

मेरी तो जैसे झांटें सुलग उठी। साली मक्कार ! देखो तो कैसी शेखी बघार रही है. उंह ! मुझे चुदवा देगी. जैस इसके बाप का माल है. साली 420. मेरी चूत में तो पहले से ही आग भरी हुई थी. ना कहती तो भी भी मुझे तो चुदना ही था. समझती क्या है, साली. क्या चूत सिर्फ़ उसी के पास है। फिर मैंने अपने आप को सम्भाला।

फिर मैंने कमरे में दाखिल होते हुये बहुत ही शरमाने का अभिनय किया।

‘चाची, सॉरी कल के लिये. पता नहीं मुझे क्या हो गया था। अंकल प्लीज सॉरी ना !’

मेरी इस अदा को देख कर अंकल का लण्ड एक बार फिर से खड़ा हो गया।

‘अरे नहीं यशोदा. सॉरी नहीं बोल बेटी. ये तो कभी कभी हो जाता है।’

मैंने धीरे से अंकल की तरफ़ देखा और मुस्करा कर शरमा गई।

‘मैं अभी आई चाची !’

जैसे ही मैं अपने कमरे की तरफ़ गई। अंकल मेरे पीछे भागे।

‘अरे राजेश. चाय तो पीते जाईये.!’

चाची उसके पीछे भागी। कुछ पलों में वो मेरे पीछे के भाग से चिपक गये थे। उसका कठोर लण्ड मेरी गाण्ड में घुसता ही जा रहा था।

‘चाची. अरे देखो तो. अंकल ने फिर अपना लण्ड मेरी गाण्ड में घुसेड़ दिया।’

‘अब क्या करूँ बेटी. तेरे ये अंकल है ही ऐसे. कैसे रोकूँ इनको। चाची जल भुन कर बोल रही थी।’

पर तब तक तो अंकल मेरी शमीज को उठा चुके थे और मेरी गाण्ड चुदने के तैयार थी.

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