मुमताज ने बुझवाई मेरी प्यास-1

मेरी शादी हुये लगभग चार साल हो चुके थे। कुछ अभागी लड़कियों में से मैं भी एक हूँ। शादी के दिन मैं बहुत खुश थी। लगा था कि जवानी की सारी खुशियाँ मैं अपने पति पर लुटा दूंगी। मैं भी मस्ती से लण्ड खाऊंगी . कितना मजा आयेगा। पर हाय री मेरी किस्मत . सुहाग रात को ही जैसे मुझ पर वज्र प्रहार हुआ। मेरा पति रात को दोस्तों के साथ बहुत दारू पी गया था। आते ही जैसे वो मुझ पर चढ़ गया। मेरे कपड़े उतार फ़ेंके और खुद भी नशे में नंगा हो गया। लण्ड देखा तो मामूली सा . शायद पांच इन्च का दुबला सा . जैसे कोई नूनी हो . एक दम कडक . मैंने भी लण्ड खाने के लिये अपनी टांगे ऊपर उठा ली . तेज बीड़ी की सड़ांध उसके मुख से आ रही थी जो दारू की महक के साथ और भी तेज बदबू दे रही थी। मैंने अपना चेहरा एक तरफ़ कर लिया, राह देखने लगी कि कब उसका लण्ड चूत में जाये और मेरी जवानी की आग बुझाये। वो दहाड़ता हुआ मेरे से लिपट गया और अपना लण्ड घुसेड़ने की कोशिश करता रहा। जैसे तैसे उसका लण्ड घुस ही गया, मैं आनन्द से भर गई तभी मेरी चूत में जैसे कीचड़ सा भर गया। वो झड़ चुका था। मैं तड़प कर रह गई।

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मैंने उसे धक्का दे कर एक तरफ़ किया और उठ कर बाथरूम में जाकर अंगुली चला कर अपना पानी निकाल लिया। अब वो नशे में बेसुध पड़ा खर्राटे भर रहा था।

“साली . रण्डी . चोद कर क्या मिल गया . साली चुदी चुदाई है !” सवेरे मेरा पति मुझ पर गुर्रा रहा था।

उसकी मां ये सब सुन रही थी। पर शायद वो उनके बारे में जानती थी। “चुप रहो . ऐसी गन्दी बातें करते हुये शरम नहीं आती . “मैंने धीरे से उलाहना दिया।

“तो बता तेरे भोसड़े में से खून क्यों नहीं निकला रात को . ?”

“वो तो आपका करते ही निकल गया था।”

मेरी बात सुन कर उसकी मां सर नीचे करके चली गई। बस अब दिन-ब-दिन यूं ही झग़ड़ा होने लगा। मैंने अपने पति के पास सोना बन्द कर दिया। एक दिन वो बिना दारू पिये . और बिना बीड़ी पिये मेरे पास आये तो मुझे लगा शायद ये सुधर गये हैं। पर लण्ड घुसाते ही वो झड़ गये . अब वो मुझ पर हर रोज़ कोशिश करते, पर नहीं बना तो नहीं बना . मैं अब जान गई थी कि ये काम के नहीं है। मैं मन ही मन सुलगती रहती थी। लगा मेरी जवानी यूँ ही चली जायेगी . यह कसक मन में उठने लगी थी। परिस्थितिवश मेरी निगाहें अब घर के बाहर उठने लगी थी।

मेरी सहेली मुमताज मेरी सभी बातें जानती थी। मेरे दिल की आग की लपटें वो भी महसूस करती थी। “गौरी, मेरा चचेरा भाई आज आ रहा है . तू कहे तो तुझे उससे मिलवा दूँ !”

“नहीं, मम्मो . मुझे शरम आवेगी . जाने दे !मैं उसकी बातों से सकपका गई थी।

पर वो जानती थी कि दबी चिंगारी से मैं कैसे जल रही थी।दूसरे दिन सवेरे ही मोबाईल पर मुमताज ने मुझे खबर भेजी कि भैया आ गया है . बस एक मिनट के लिये मिलने आजा।मैं सोच में पड़ गई, कि कैसा होगा . कहीं यह भी मेरे पति जैसा ना हो। इसी उधेड़बुन में मैं उसके यहाँ पहुंच गई।

“अल्लाह रे अल्लाह . ये . तेरा भाई है . ? !!” यूनानी मूर्ति की तरह एक हसीन लौण्डा सामने मुस्कुरा रहा था। मैं तो उसे देखते ही जैसे घायल सी हो गई। मैंने अपने लिये इतने हसीन नौजवान की कल्पना तक नहीं की थी।

“चुप हो जा गौरी . मस्त लण्ड है इसका . जैसे मुझे चोदता है ना . तुझे भी भचक-भचक करके चोद देगा . देख है ना छः फ़ुटा . गोरा चिट्टा . पहलवान . !”

“मेरे मौला . इसकी पोन्द कितनी मस्त है . तू भी उससे चुदाती है ?” “ऐसी मस्त चीज़ को भला मैं हाथ जाने देती . ये मेरी किस्मत का है गौरी !”मम्मो मुस्करा उठी। उसकी कसी हुई जीन्स देख कर जैसे मैं तड़प उठी। यही है जिसकी बात मम्मो कर रही थी। ये तो मुझे पूरा लूट ही लेगा।

“ऐ मोडी . हां तू . इसे अन्दर रख दे . ! ” साजिद ने पुकार कर कहा।

मैंने अपनी तरफ़ अंगुली कर के कहा,”क्या मैं . ?”मैं झिझकते बोली। “अरे . आप . ! आप कौन है . ! आं हां . नहीं मोहतरमा, मैं तो सुरैया को बुला रहा था।” उसने मुझे घूर कर देखा। मैं शर्मा सी गई। मैं तो दिल ही दिल में उस पर मर मिटी।

वो धीरे धीरे चलता हुआ मेरे करीब आ गया . “आप तो बहुत खूबसूरत है . खुदा ने कैसा तराशा है . !” उसने मुझे नीचे से ऊपर तक देखा। “हाय अल्लाह . तेरे अकेले पर ही जवानी फ़ूटी है क्या .”मैंने उसे गाली सी दी और हंस पड़ी। “नहीं आप पर जवानी फ़ूट रही है . जरा कभी आईने में देखो . बला की खूबसूरती है आप में !” वो बेशर्मी से बोले जा रहा था।

“मर जा मरदूद . आग लगे तेरी जवानी को . ” मैं उसकी बेबाकी पर उसे गालियाँ देने लगी। “अरे गौरी . साजिद का प्यार भरा पैगाम कबूल तो कर ले !” मम्मो ने मुझे बहलाया। “हाय री मम्मो देख तो कैसी मुह-जोरी कर रहा है !” फिर मैंने एक तिरछी नजर की उस पर कटार चलाई। लगा कि तीर दिल पर चल गया है। मैंने मुस्करा कर उसे देखा। अब तो वही मेरा तारणहार था . उसे मेरा उदघाटन करना था . मेरा उद्धार करना था। मेरी मुस्कराहट को उसके मेरा जवाब समझ कर मुस्करा दिया। तभी मुमताज उसके पास गई और उसके कान में कुछ कहा। उसने अपना सर हिलाया और वो मुमताज के पीछे पीछे चल दिया। मुमताज ने मुझे आंख मार कर इशारा कर दिया। मेरा दिल धड़क उठा। क्या मामला अभी . नहीं . नहीं . इतनी जल्दी कैसे होगा। पर नजर का जादू चल जाये तो क्या जल्दी और क्या देर . मेरा घायल दिल और परेशां दिमाग . खुदा की मरजी . हाय मेरे दिलदार . मन की कश्ती मौजों से घिर गई। मेरे कदम मुमताज के कमरे की ओर बढ़ चले। “दिल नर्म . जबां गरम . जिस्म शोला . जाने किस की जान लोगी !” “हाय अल्लाह . ऐसे ना कहो . ! ” मैं शर्म से जैसे लाल हो गई। “जवानी बला की, खूबसूरती जहां की . तन तराशा हुआ . खुदा ने जवानी की यही तस्वीर बनाई है !” साजिद मेरे गुणगान में लगा था। मेरी उलझी हुई लटें मेरे चेहरे पर आ गई। जुल्फ़ों के बीच में से मैंने उसे देखा . वो जैसे तड़प उठा,” सुभान अल्लाह . ये हंसी चेहरा . जनाब का क्या इरादा है।” साजिद को आशिकाना लहजे में देख कर मुमताज वहाँ से चली गई। साजिद मेरे करीब आ गया। “आदाब . संजू जी !”मैंने झुकी पलकों और चुन्नी में चेहरे को लपेटे शरमाते हुये कहा।”आपने कहा आदाब . हमने कहा जनाब हमारी तकदीर . आ दाब दूँ !” उसकी शरारत मेरे दिल को चीर गई।”धत्त् . आपकी बातें बहुत मन को भाती है . “मैंने उसे बढ़ावा दिया। नतीजा तुरन्त सामने आया। उसने मुझे अपने पास खींच लिया . “गौरी . मम्मो ने मुझे आपके बारे में बताया है . आप फ़िक्र ना करें . आप मुझे लूट सकती हैं . ये मुजस्मां आपका ही है . जैसे चाहो . जहां चाहो . इसे अपने रंग में रंग लो !””हमें डर लगता है . कहीं उनको पता ना चल जाये . !” मेरे माथे पर पसीना छलक आया था। “देखिये मोहतरमा . इश्क और मुश्क छिपाये नहीं छिपता है . ये तो तन की प्यास है कोई इश्क मुश्क नहीं . मम्मो को रोज चोदता हूँ . आप भी वहीं पर . ” मैंने उसके अधरों पर अंगुली रख कर उसे चुप कर दिया। मैं उसकी बातों पर रीझ गई थी, शरम से लाल हो रही थी। वह तो बेहयाई से बोला जा रहा था। “बस ऐसे ना कहो . शरम भी कुछ चीज़ है !”मैंने उसकी चौड़ी छाती पर अपना सर रख दिया। “गौरी . ऊपर वाले कमरे में चले जाओ . मैं बाहर से ताला लगा देती हूँ . वहाँ बाथरूम भी है . संजू अभी जा रहे हो क्या ?” मुमताज ने हमें ऊपर का रास्ता बता दिया। “आजा गौरी . ऊपर आ जा !” और हंसता हुआ वो छलांगें मारता हुआ ऊपर चला गया। मैं मुमताज से शरम के मारे लिपट गई। मुमताज की आंखों में आंसू थे . “जा मेरी गौरी . अपना सपना पूरा कर ले . मन भर ले . तेरी आज सुहागरात नहीं सुहाग दिन है ऐसा समझ ले . जा मेरी प्यारी सहेली . मैं तुझ पर सदके जाऊं !””मम्मो, मेरी जान . मेरी सच्ची सहेली, तुझ पर कुर्बान जाऊं . “मैंने प्यार से उसके होंठो को चूम लिया। मैंने अपने नजरें नीची की और चुन्नी चेहरे पर डाल ली और धीरे धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी . । मुमताज नीचे से ऊपर जाते हुये मुझे देखती रही। अन्तिम सीढ़ी चढ़ कर मैंने पलट कर मुमताज को देखा। मुमताज ने प्यार से हाथ हिला दिया। मैंने भी उसे हाथ से एक प्यार भरा बोसा दे दिया और शरमा गई। मैंने दरवाजा खोला और कमरे के अन्दर समा गई। उसी समय बाहों के घेरे मेरी कमर से लिपट गये। मैं सिमट सी गई। मेरे गालों पर एक प्यार भरा चुम्बन भर दिया। मैंने पलट कर संजू को देखा। मैंने अपने आपको छुड़ाने की असफ़ल कोशिश की। उसकी आंखों में प्यार उमड़ रहा था। उसने मुझे गले से लगा लिया और मुख से मुख रगड़ खा गये। उसकी खुशबू भरी सांसें मेरे जिस्म में बसने लगी। उसके हाथ मेरे सर पर नरम बालों में अंगुलियों से मालिश से सहलाने लगे। उसकी शरीर की गर्मी मुझे पिघलाने लगी।”मेरे मालिक . मेरे आका . मुझे अपनी दासी बना लो . अपने दिल में जगह दे दो” मैं उसके कदमो में झुक सी गई। उसने मुझे सम्भालते हुये कहा,”हुस्न-ए-मलिका, तुझ पर बहार आई हुई है . तेरे ख्वाब अब मेरे हैं . इन्शा अल्लाह . आज से तू मेरी हुई . तुझ पर खुदा का फ़जल बना रहे . तू मेरी बने रहना . आज से तेरा दुख मेरा है और मेरी खुशी तेरी है . या मेरे अल्लाह . !”मैं संजू के शरीर से लिपटती चली गई। एक मोहक सी वासना घर करने लगी। सुन्दर, मनमोहक, काम देवता सा कामुक रूप जैसे शरीर का मालिक था संजू।मेरे नसीब में उसका सुख लिखा था। मेरी चूनरी मेरी छाती से ढलक गई थी। मेरे उन्नत उभार जैसे पहाड़ियों के तीखे शिखर उसके हाथों में मचल उठे। उसने मेरे ब्लाउज के बटन चट चट करके खोल डाले। मेरा गोरा तन उसकी आंखो में समा गया। मेरे उभार कठोर हो चुके थे। जिया धक धक करने लगा था। दिल जैसे उछल कर बाहर निकला जा रहा था। मेरी साड़ी उसने धीरे से उतार कर पास में रख दी। शायद मेरे पोन्द और चूत की कल्पना उसके दिल को बींध रही थी। ऐसे में उसने अपना जीन्स और चड्डी भी उतार दिया और अपना लण्ड मेरे सामने कर दिया।”हुजूर की तमन्ना हो तो शौक फ़रमायें . आपकी सेवा में लण्ड हाजिर है !” उसका मर्दाना लण्ड देख कर मैं एकबारगी सिहर गई। आह्ह्ह् . लण्ड इसे कहते हैं !!! मैं असली मर्द को देख कर शरमा गई। उसने बड़े सम्मान के साथ अपना लण्ड मेरे होंठों के आगे पेश कर दिया। मैं अपना बड़ा सा मुह फ़ाड़ कर उसे जैसे निगलने की कोशिश करने लगी। इतना बड़ा और मोटा था कि मुँह में भी ठीक से नहीं आ रहा था। थोड़ी देर तक लण्ड का रस पान किया, पर मैंने ऐसा कभी नहीं किया था। “मेरे दिलवर, आपकी नजरे-इनायत चाहिये . बस मेरी गहराईयों में अब शहद भर दीजिये . मुझे जन्नत की सैर को जाना है . “मैंने शरमाते . और झिझकते हुये मन की बात कह दी।”जनाबे आली, बिस्तर हाजिर है . इल्तिजा है आप अपने नरम और गरम चूतड़ों की तशरीफ़ यहां रखें !”

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