साहब का मनचला प्यार

तो साहब बोले – नहीं यार, उसको ये सब पंसद नहीं है. पता नहीं क्या औरत है? इसके बिना क्या मजा कैसा? चूसने और चुसाने में ज्यादा मजा आता है लेकिन पता नहीं उसको क्यों नहीं पसंद!

अब मैं पूरा का पूरा मुंह में लेकर मजे देने लगी और फिर बोली, “साहब कभी आप पीछे की चुदाई का मजा लिये हो?” तो वो बोले, “नहीं यार, अब तक तो नहीं किया.” अब मैं बोली – जब पीछे का मज़ा नहीं लिया तो क्या लिया. खैर, चलो आज मैं आपको मजा कराती हूँ.

फिर हम बाथरूम में आ गये और अब हम दोनों अपने – अपने कपड़े अपने बदन से अलग कर चुके थे. फिर साहब बोली – कितनी रोशनी है न, यहां अच्छा नहीं लग रहा है.

साहब बोले – यहां क्यों अच्छा नहीं लग रहा है?

मैं बोली – साहब, शर्म आती है.

अब साहब बोले – अच्छा जी, और क्या आता है आप को?

अब मैं बोली – लो न साहब, जल्दी करो न. समय खराब खोटा न करो.

फिर थोड़ा रुक कर मैं बोली – साहब, आप का मैं साफ कर दूं फिर आप मेरा करना ठीक है.

और फिर मैं साबुन ले कर उनके लंड को नहलाने लगी. लन्ड को झाग में डूबा हुआ देख कर मैं साहब से बोली, “बहुत मज़ा आ रहा है न साहब”. साहब ने भी हां में अपना सिर हिलाया. फिर मैं पीछे हो गई और अब साहब पीछे जाकर मेरी गांड़ पर अपना लन्ड रगड़ ही रहे थे कि तभी मैं बोली, “साहब, अब धीरे – धीरे अंदर डाल ही दो.”

यह सुन कर साहब ने छेद पर लन्ड रखा और धक्का मार दिया. दूसरी तरफ मैंने खुद पीछे की तरफ धक्का मार कर लन्ड को अपने अंदर कर लिया. फिर साहब ने अपनी स्पीड बढा दी. अब मैं कहने लगी, “साहब, जल्दी – जल्दी करो न, आह आह और जोर से ओहहह आहहह”, “साहब, कुछ गिर रहा है”. तो साहब ने कहा, “मनचली, जो गिर रहा है गिरने दो उसे, बहुत मजा आ रहा है”.

फिर साहब मेरी गांड़ में झड़ गए. अब उनका लन्ड एक दम छोटा सा हो गया था. यह देख कर मैं बोली, “कोई बात नहीं साहब, अब मेरा कमाल देखना कैसे 10 मिनट में मैं इस शेर को जगाती हूँ.

फिर मैंने लंड को साफ कर मुंह में ले लिया और पीने लगी. काफी देर बाद वो फिर से खड़ा हो गया. अब मैं बोली, “साहब, अब मैं आपके साथ जो करूंगी देखना उसमें कितना मजा आएगा”. फिर यह कह कर मैंने उन्हें बेडरूम में चलने को कहा. इस पर साहब ने कहा कि देखना कहीं कुछ गड़बड़ ना हो जाये. तो मैं उनसे कहा, “साहब, आप फ्रिक न करो, कुछ गड़बड़ नहीं होगा”.

यह बोल कर मैंने उसे घक्का मार कर गिरा दिया और फिर उनके ऊपर आ गयी और उनसे बोली – साहब, अब आप लड़की और मैं लड़का, देखना कैसे चुदायी करती हूँ मैं आपकी.

इतना बोलने के बाद फिर मैंने अपने दोनों पैर फैला कर साहब का लंड अपने चूत में ले लिया और खुद चुदायी करने लगी. साहब को और मुझे बहुत मज़ा आ रहा था. अब साहब बोले – बहुत मज़ा आ रहा है यार, इस पोज के बारे में तो मैंने सपने में भी कल्पना नहीं की थी.

ऊपर होकर मैं ऐसी चुदाई कर रही करने लगी थी मानो वाकई में एक लड़का, एक लडकी की चुदाई कर रहा हो. मैंने भी पहली बार इस प्रकार की चुदाई की थी और उत्तेजना वश अब मैं झड़ने वाली थी इसलिए साहब के दोनों पैर अपने हाथों से थोड़ा और फैला कर मैं पूरी स्पीड से चुदाई करने लगी.

हम दोनों को बहुत मजा आ रहा था. फिर थोड़ी देर बाद मैं झड़ने लगी और स्पीड से चुदाई करते हुए साहब के बदन पर गिर गई और फिर साहब से बोली, “मजा आया न साहब”. साहब बोले, “हां मनचला, बहुत मज़ा आया यार”.

फिर मैं बोली – साहब, मेरी एक मालकिन है वो मेरे को रोज कहती है कि एक आदमी ला कर दे मैं तुम्हें भी और उसे भी रूपए दूंगी.

अब साहब थोड़ा चौंक कर बोले – क्यों पति नहीं है क्या?

मैं – है न साहब, लेकिन सिर्फ नाम का है. सुबह से रात तक काम ही काम. बस महीने में एक – दो बार करता है वो भी ठीक से नहीं. तो अगर आप कहें तो मैं बात करूं.

यह सुनते ही साहब एक दम खुश होते हुए बोले, “सच, तब तो बहुत मजा आयेगा”.

अब मैं बोली – हां साहब, फिर तो हम तीनों एक साथ होगें और मस्ती करेंगे.

उसके बाद फिर मैं घर चली आई और फिर मैंने अपनी उस मालकिन को बता दिया और साहब को ले जाकर फिर हम तीनों ने बहुत मज़े किए और पैसे भी बनाए लेकिन वो कहानी फिर कभी.